चंद्रधर शर्मा गुलेरी
चंद्रधर शर्मा गुलेरी का जन्म 1883 ई. तथा मृत्यु 1922 ई. में हुई । गुलेरी जी हिन्दी नवजागरण के अग्रदूतों में अग्रगण्य रहे हैं। आप संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान होने के साथ-साथ हिन्दी के स्वनामधन्य विद्वान थे। आज भी वे हिन्दी आलोचना, भाषा शास्त्र, हिन्दी कहानी, निबंध के लेखक के रूप में सुविख्यात हैं। आप अंग्रेजी के भी अच्छे जानकार रहे हैं। आपने अजमेर के मेयो कॉलेज में बहुत दिनों तक अध्यापन कार्य किया। तदुपरांत काशी हिन्दू वि. वि. के संस्कृत महाविद्यालय में आचार्य के रूप में अपनी सेवाएँ दीं। 1902 ई. में आपके संपादन में 'समालोचक' नामक आलोचना का पत्र भी निकला। हिन्दी कहानी साहित्य को आपने छह कहानियाँ दी हैं। ‘सुखमय जीवन' (1911), 'बुद्ध का काँटा' - (1914-15) 'उसने कहा था ' -(1915) बहुत प्रसिद्ध हैं। इनमें से आपकी अक्षय कृति का आधार 'उसने कहा था' नामक कहानी अत्यंत विख्यात कहानी है। वस्तु और कला की दृष्टि से यह ऊँचाई इसलिए भी अनुपमेय है कि 1915 तक हिन्दी कहानी अपनी शैशवावस्था में ही थी। 'उसने कहा था' के प्रकाशन से वह अचानक प्रौढ़ हो गयी।
'बुद्ध का काँटा' उसने कहा था से पूर्व की रचना है। कहानीकार से पूर्व गुलेरी जी निबंधकार के रूप में ख्यात हो चुके थे। कोई भी पाठक 'बुद्ध का काँटा' पढ़ कर सहज ही अनुमान कर सकता है कि इसमें निबंध और कहानी - दोनों विधाओं का मिश्रण है। शिल्प और वस्तु दोनों स्तरों पर यह संक्रमणशील है। जिस प्रेम को आज का भारतीय समाज अत्यंत हेय दृष्टि से देखता है, वह यहाँ नया रूप-ग्रहण करता है। 'उसने कहा था' का प्रेम यदि आदर्श की प्रतिष्ठा करता है और प्रेम की बलिवेदी पर न्यौछावर होने की प्रेरणा देता है तो 'बुद्ध का काँटा' कहानी स्वस्थ मानवीय प्रेम की झलक प्रस्तुत करती है। कहानी में कथा-रस भरपूर है। पनघट प्रसंग कहानी का मार्मिक स्थल है। शीर्षक में आया हुआ 'काँटा' आगे की घटना में आता है। का काँटा' कहानी का कथानक दो प्रसंगों में अपनी अर्थवत्ता कायम करता है - एक वह काँटा जिससे रघुनाथ ने भागवंती को चुभा काँटा निकाला था और दूसरा वह जो उसके खुद के दिल में चुभा था, जिसे भागवंती ने निकाला ।
